सिद्ध चिकित्सा पद्धति

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आयुर्वेद की तरह ही सिद्ध भी भारत की एक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है। यह द्रविड़ों से उद्गमित हुई है तथा इसके सभी ग्रंथ तमिल भाषा में ही पाए जाते है। सिद्ध और आयुर्वेद के मूल सिद्धांत एक ही हैं; फर्क है तो इनके विवरण में। सिद्ध द्रविड़ सभ्यता की जड़ों से प्रभावित शैली है जिसे आप शिव ग्रन्थों में भी पहचान सकते हैं।

सिद्ध का ज्ञान

शैव परम्परा के ग्रन्थों की मानें तो सिद्ध पद्धति का ज्ञान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को दिया। पार्वती ने यह ज्ञान नंदी को दिया जिन्हों इसे सिद्धों को बांटा। यह सिद्ध ऐसे व्यक्तियों को कहा जा रहा है जो सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं, यानि अनुशासन से शरीर और मन पर नियन्त्रण पा चुके हैं।

कथा के अनुसार 18 सिद्ध हुए- नंदी, अगस्थियर. थिरुमुलर, पुन्नक्कीसर, पुलस्थियर, पूनैकंनर, इदैक्कादर, बोगार, पुलिकैसर, करुवुरर, कोंकनवर, कलंगी, सत्तैनथर, अज्हुग्न्नी, अगप्पाई, पुम्बत्ति, थेरैयर और कुधाम्बाई। इनमें से अगस्थैयर या अगस्त्य ऋषि को श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही अन्य ऋषियों के ज्ञान का प्रभाव भी दुनिया भर की विभिन्न परम्पराओं पर देखा जाता है।

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सिद्ध चिकित्सा प्रणाली का दुनियाभर पर असर

सिद्ध में धातु, खनिज और रसायनों का उपयोग मुख्य रूप से किया जाता है। अंग्रेजी में धातु से और भी उपयोगी चीज़ें बनाने की पद्धति को अल्केमी कहा जाता है जिसकी जड़ें भी सिद्ध पद्धति से आती हैं। वाग्भट ने छठवी शताब्दी में इस विज्ञान की शुरुआत की थी।

नौवी से 18वी शताब्दी के बीच रसाशास्त्र ने वर्तमान रूप लिया और रसायनों पर मुख्य ग्रन्थ लिखे गये। अगस्त्यमुनि और ऋषि बोगार के ग्रन्थों में चीन से रिश्तों के विवरण मिलता है। मन जाता है की ये दोनों ही ऋषि चीनी थे जो भारत में आकर चिकित्सा पद्धति का संचार कर रहे थे।

तमिल में शिव के एक रूप को लिंगम कहा जाता है। तमिल में मेर्कुरिक सल्फाइड को भी इसी नाम से जाना जाता है। माना जाता है की यह अष्टबंध का प्रमुख घटक है तथा जीवन में उर्जा संचार के लिए अद्भुत रूप से काम करता है।

तमिलनाडु के एक सिद्धार, रामादेवर अपने ग्रन्थ में लिखते हैं की वे मक्का गये और याकूब का नाम लेकर अरब देश में धातु विज्ञान सिखाकर आए। यही वजह है की इस्लामिक और भारतीय ग्रन्थों में धातु विज्ञान एक जेसा ही मिलता है।

सिद्ध के मूलमंत्र

आमतौर पर सिद्ध और आयुर्वेद एक तरह के ही सिद्धांत धारण करता है। आपके शरीर में तीन दोष होते हैं-वाथम, पीथम और कपम। इनके संतुलन से ही आरोग्य होता है तथा इनके असंतुलित होने से बीमारियाँ आती हैं।

सिद्ध पद्धति के अनुसार आहार और दिनचर्या न सिर्फ स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है, बल्कि रोगों के उपचार में भी बड़ी भूमिका निभाती है। यही वजह है की सिद्ध में पथ्य और अपथ्य बताए जाते हैं। ये सही और गलत आदतों की ओर इशारा करते हैं।

सिद्ध में रोगों की जांच कैसे होती है?

आपको कौनसी बीमारी हुई है यह जानने के लिए अष्टस्थान परीक्षा होती है जिसमें आपके शरीर के 8 हिस्सों की जांच की जाती है-

जीभ- आपकी जीभ वात होने पर काली, पित्त होने पर पीली या लाल तथा कफ होने पर सफ़ेद होती है।

रंग- आपके चेहरे की रंगत वात में गहरी, पित्त में पीली या लाल तथा कफ में फीकी हो जाती है।

स्वर- वात में आपकी आवाज़ सामान्य बनी रहती है वहीँ पित्त में ऊँची तथा कफ में गहरी होती है।

आँखें- पित्त में पीली या लाल तथा कफ में फीकी होती है।

स्पर्श- वात में शुष्क, पित्त में गर्म तथा कफ़ में ठंडा।

मल- मल का रंग काला होना वात, पीला होना पित्त तथा हल्का होना कफ़ दिखाता है।

मूत्र- इस जांच के लिए सुबह का समय चुना जाता है। मूत्र का रंग भूसे जैसा होना अपच दर्शाता है, लाल-पीला होना अत्यधिक गर्मी तथा उच्च रक्तचाप, केसरिया होना पीलिया तथा लाल रंग किडनी के रोगों की ओर इशारा करता है।

नाड़ी- यह मुख्य नाड़ियों की ताल की जांच कर रोगों का होना सुनिश्चित करता है।

इस तरह आयुर्वेद की तरह ही सिद्ध चिकित्सा पद्धति भी सदियों पुराने ज्ञान और अनुभव से आपके रोगों का हल खोजती है। दक्षिण का यह विज्ञान आप भी अपने जीवन में उतार कर निरोगी काया का मार्ग चुन सकते हैं।

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