जानिए आयुर्वेद का आधुनिक जीवनशैली में उपयोग

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image credit: udaydinmaan.co.in

आयुर्वेद इस दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणाली है जो प्राकृतिक रूप से मिलने दवाओं की मदद से उपचार करती है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेद में कई बड़े फर्क हैं जो बीमारी को समझने से लेकर जीवन के प्रति नज़रिए तक में नजर आते हैं। (use of ayurveda in daily life, treatment of infertility, diabetes, lose weight)

आयुर्वेद जीवन के हर हिस्से को पूरी क्षमता से जीने के लिए कई सुझाव देता है। ये सभी बेशक प्रभावी हैं लेकिन बदली हुई दुनिया में रहने वालों के लिए इन्हें अपनाना सरल नहीं है। इसी बदली जीवनशैली के साथ चलने के लिए हाल के सालों में आयुर्वेद में बड़े परिवर्तन आएं हैं।

 

क्या हैं ये परिवर्तन और इनका आप पर क्या प्रभाव होगा, आइये जानते हैं-

 

ज्ञान को दस्तावेज करना 

आयुर्वेद का ज्यादातर ज्ञान अनुभव और चिन्तन द्वारा अर्जित किया गया और कहकर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाया गया। आज के समय में जब दस्तावेजों की एहमियत तेज़ी से बढ़ रही है, तो दुनियाभर के कई शोधकर्ता आयुर्वेद के इस मौखिक ज्ञान को भी दस्तावेज़ का रूप देने में जुट गये हैं। इस तरह यह ज्ञान अब इंटरनेट और किताबों के ज़रिये आम व्यक्तियों तक भी पहुँच रहा है और लोग स्व-चिकित्सा को भी जीवन में जगह दे रहे हैं।

 

दवाओं की गुणवत्ता

दवा बनाए जाने का कोई मापदंड न होने की वजह से हर दवाखाना अपने ज्ञान के अनुसार दवा तैयार करता था। इस प्रक्रिया में मिलावट, घटी गुणवत्ता और विश्वसनीयता का आभाव जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। आज कई बड़े संस्थान दवाओं के लिए मापदंड तैयार कर चुके हैं जिनके आधार पर ही दवाएं बनाई जाती हैं। ज़ाहिर है, अब आप सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त कंपनियों से विश्वसनीय दवाएं ले सकते हैं।

 

आधारिक संरचना

आयुर्वेद की दवा पारम्परिक रूप से चिकित्सक ही बनाता है। ऐसे में एक समय में थोड़ी ही मात्रा में दवा तैयार हो सकती है। यह तरीका लाखों लोगों की मांग को पूरा नहीं कर सकता। इस तरीके की जगह आज मशीनों ने ली है जो सरकारी मापदन्डों के आधार पर न सिर्फ दवाएं तैयार करती हैं बल्कि इन्हें इस तरह पैक करती हैं की इन्हें खरीदने वालों को भी सुविधा हो तथा अन्य पद्धतियों के दवा की पैकेजिंग का मुकाबला भी किया जा सके।

 

क्लीनिकल ट्रायल 

एलॉपथी की हर दवा को बाज़ार में बेचने से पहले कई तरह की जांचों से गुजरना होता है। इसका ही एक हिस्सा होते हैं क्लीनिकल ट्रायल्स जिसमें जानवरों पर दवाओं के असर को जांचा जाता है। यह सुरक्षा की दृष्टि से बेहद ज़रूरी है। आयुर्वेद की दवाएं भी अब इन्हीं जांचों से गुजर रही हैं और सुरक्षित पाई जाने पर ही बाज़ार मर उतारी जाती हैं।

 

गलत उपयोग 

माना जाता है की हर्बल दवाओं का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। यह तभी तक सच है जब तक दवाओं का उपयोग सीमित मात्रा में किया जाए। इन दवाओं की कितनी मात्रा ली जानी चाहिए तथा इनके गलत उपयोग के क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अब शोध के दायरे में हैं तथा उपभोक्ताओं को यह जानकारी देना भी ज़रूरी कर दिया गया है।

 

शोध 

दवाओं का असर, इन्हें बनाने के लिए ज़रूरी सामग्रियों की उपलब्धता, बाज़ार से कमाया जा सकने वाला लाभ, दवा बनाने के बेहतर तरीके, अन्य पद्धतियों के साथ दवा लेने के फायदे और नुकसान आदि बिंदु पर सटीक जानकारी देने के लिए शोध बेहद ज़रूरी हैं। अन्य पद्धतियों की तरह आयुर्वेद में भी अब बड़े पैमाने पर शोध के लिए निवेश हो रहा है। इस तरह आयुर्वेद अब सिर्फ प्राचीन ग्रन्थों तक सीमित नहीं बल्कि आधुनिक शोधों के अनुसार भी बढ़ रहा है।