वेस्ट नाइल वायरस से करें अपने परिवार का बचाव 

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Image Credits: CDC

मार्च में केरला के मलप्पुरम जिले में एक सात साल के बच्चे की वेस्ट नाइल फीवर से मृत्यु हो गयी। इस रोग का यह पहला मामला नहीं था। आइये जानते हैं क्या है वेस्ट नाइल रोग और क्यों इससे बचाव बेहद महत्वपूर्ण है-

वेस्ट नाइल वायरस 

वेस्ट नाइल वायरस एक RNA(ribonucleic acid) वायरस है जो की फ्लेविवायरस है। इसका मतलब वेस्ट नाइल फीवर का कारक बहुत तरह से जापानीज इन्सेफेलाइटिस, सैंट लुइस इन्सेफेलाइटिस व् येलो फेवर की तरह है। इससे होने वाला रोग वेस्ट नाइल फीवर मूलतः जानवरों और इंसानों को एक तरह से असर करता है। प्राकृतिक रूप से चिड़िया और मच्छर के बीच चक्र की तरह रहने वाला यह वायरस इंसानों को मच्छर के काटने से ही होता है। इसी वजह से अक्सर चिड़ियों के प्रवासी पथ पर पड़ने वाले देशों में यह तेज़ी से फैलता है।

देश और दुनिया में वेस्ट नाइल फीवर 

दुनिया भर में पहली बार इस रोग को यूगांडा के वेस्ट नाइल में 1937 में देखा गया। इसके बाद इजराइल में 1951 में यह एक महामारी की तरह फैला। इसके बाद 1999 से अब तक यह रोग पुरे अमेरिकी महाद्वीप में फ़ैल चूका है।

भारत में उदयपुर और इसके बाद महाराष्ट्र के कुछ जिलों में इसके रोगी पाए गये। पर गौर करने वाले बात यह है की इसके बाद जब विभिन्न प्रदेशों से लोगों के वीर्य को लेकर इसकी जांच की गयी तो इनमें वेस्ट नाइल वायरस की प्रतिरोधी कोशिकाएं पाई गयी। मई 2011 में केरला में AEC के फैलने के समय वेस्ट नाइल फीवर के मामले भी देखे गये। इसके बाद से अब तक केरला में इस रोग के कई मरीज़ सामने आए हैं।

वेस्ट नाइल फीवर के लक्षण 

इस रोग के लक्षण डेंगू की तरह होते हैं- इसके होने पर आप सिरदर्द, उलटी, जी मिचलाना, थकान, बुखार शरीर दर्द आदि महसूस करते हैं। पर इस रोग से ग्रसित 80 प्रतिशत लोगों में कोई भी लक्षण नजर नहीं आता। ऐसे में समझदारी इसी में है की अगर आपके आस-पास यह रोग फैले तो आप खुद भी जाकर अपनी जांच कराएं।

वेस्ट नाइल वायरस से बचाव 

इस वायरस के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है। इससे बचने के लिए दो संभव तरीके हैं- कोशिश करें की आप मच्छरों से बचें तथा घर में मच्छरों को न घुसने दें। इसके अलावा घर के आस-पास कहीं भी पानी को जमा न होने दें। कूलर, गमले, नाली आदि में जमा पानी को हटाएं।