भूतशुद्धि : अपने शरीर में जल तत्व संतुलित कर पाएं बीमारियों से छुटकारा

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जल तत्व, जिसे संस्कृत में अपस भी कहते हैं, शरीर का निर्माण करने वाला चौथा तत्व है। पांच महाभूत तत्वों से बने हमारे शरीर में सबसे बड़ी मात्रा पानी की ही है। ऐसे में इस तत्व को संतुलित कर लेना आपको स्वस्थ रहने सहज योग के अभ्यास का तरीका है।

पानी को स्वछता और शुद्धता के साथ पीना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है इसके सही तरह से ग्रहण करना। आइये जानते हैं पारम्परिक रूप से पानी को किस तरह ग्रहण करने की सलाह दी जाती है-

 

  • पानी एक पोलर तरल है। इसका अर्थ है की यह अपने आस पास की तरंगों को अपने अंदर याद की तरह रख रख सकता है। इस बात का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। घर में साफ़ जगह पर पानी रखें और बाहर से आए पानी को आधे दिन के लिए उपयोग न करें।
  • पानी को तांबे के बर्तन में रखने का प्रयास करें। अगर यह संभव नहीं तो कम से कम इसे प्लास्टिक के बर्तन में न रखें; धातु का उपयोग करें। प्लास्टिक कई तरह की बीमारियों का कारण बन सकता है बी=वहीँ तांबा कई रोगों को हर सकता है।
  • पानी के आस पास सकरात्मक माहौल रखें। पुराने समय में रोज़ाना पानी की पूजा की जाती थी। अगर आपके घर में ऐसी मान्यताएं हैं तो इनका पालन करें। वैज्ञानिक शोधों में भी पाया गया है की सकरात्मक विचार पानी को और भी हितकारी बना देते हैं।
  • पानी को हमेशा बैठ कर पियें। खाना खाने से थोड़ी देर पहले तथा तथा इसके थोड़ी देर बाद ही पानी पियें।
  • घूंट-घूंट कर पानी न पियें। एक ही बार में एक गिलास पानी पियें ताकि शरीर की ज़रूरत पूरी हो जाए लेकिन इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन न बिगड़े।
  • बारिश के दिनों में प्यास कम लग सकती है। अपने शरीर पर विश्वास रखें और ज़रूरत से ज़्यादा पानी पीने की कोशिश न करें।
  • कैफीन, कोक आदि पानी के विकल्प नहीं हैं।
  • अगर अपच रहती है तो पानी को गुनगुना कर पियें। पानी पीते हुए पूरा ध्यान इस क्रिया पर ले जाएं; देखा जाता है की ऐसा करने पर शरीर पानी को अवशोषित जल्दी कर पाता है।
  • गौर करेंगे तो आप पाएंगे की झरने के पास का पानी ज़्यादा मुलायम महसूस होता है। इसकी वजह ऊंचाई से गिरने की वजह से इसका मथना है। आजकल कई बोतल भी उपलब्ध है जिनकी मदद से आप पानी मथ सकते हैं। देखा जाता है की यह मथा हुआ पानी शरीर की बारीक नसों को खोलता और साफ़ करता है। इसे भी ज़रूर आज़माएँ।