गर्भावस्था– मातृत्व का पहला चरण, बरतें सावधानियां, अपनाएं यह आयुर्वेदिक उपचार

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image caption: cdn2.momjunction.com

किसी भी महिला के लिए मातृत्व का अनुभव सबसे परे है। और इसी मातृत्व के लिए प्रथम चरण गर्भावस्था है। वैसे तो गर्भाव्स्था का समय किसी भी महिला के लिए बहुत ही चुनौती पूर्ण होता है, और किसी किसी के लिए कुछ बहुत ही दुखदायी बन जाता है। यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो यह 9 महीनें आसानी से व्यतीत किए जा सकते हैं। और मातृत्व का सुख भी पाया जा सकता है।

 

यहां हम बात करेंगे गर्भावस्था (pregnancy) के दौरान होने वाली सामान्य और ज्यादातर पायी जाने वाली समस्याओं की। लेकिन यदि गर्भावस्था के दौरान किसी गम्भीर बिमारी के लक्षण दिखाई दें तो तत्काल चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए। जैसे उच्च रक्तचाप, सांस लेने में परेशानी, हृदयरोग, शरीर के किसी भाग में तेज दर्द होना, थाइरॉइड की समस्या, टी.बी. या पुराना बुखार,किडनी के रोग, गर्भावस्था के समय योनि से रक्त आना जिससे गर्भपात का खतरा हो सकता हो व स्त्री की जान खतरे में पड़ सकती हो। ऐसी अवस्थाएं गम्भीर होने से इन्हें बीमारियों के नाम से अवगत कराया जा रहा है। इनके लिए चिकित्सक द्वारा इलाज कराना ही बेहतर होता है।

 

 

गर्भकाल पूरा होने पर या किसी भी तरह की प्रसव पीड़ा और दर्द की शुरूआत हो तो तत्काल अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय पचार द्वार प्रसव कराना चाहिए जिससे माता और शिशु दोनों के जीवन की सुरक्षा आसानी से की जा सके।

 

 

1. जी मिचलाना या उल्टी होना- गर्भावस्था का यह पहला सामान्य लक्षण या रोग है। इसमें सुबह उठते ही गर्भवती का जी मिचलाता है, मुंह में खट्टा पानी आता है या उल्टियां होती हैं, इसलिए इसे मार्निग सिकनेस कहते हैं। सामान्यतः यह समस्या प्रारम्भिक डेढ़-दो माह रहकर स्वतः ही समाप्त हो जाती है लेकिन बहुत सी गर्भवती स्त्रियों को यह समस्या पूरे नौ मास परेशान करती है।

इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो गर्भवती को खाली पेट यानी भूखे नहीं रहना चाहिए। सुबह उठने के बाद शौचक्रिया से निवृत्त होकर चाय या दूध के साथ बिस्किट्स या हल्का नाश्ता लेना चाहिए और भोजन के समय को टालना नहीं चाहिए।

 

2. मूत्रत्याग की आवृत्ति में वृद्धि- गर्भधारण उपरान्त जब गर्भाशय का आकार बढ़ने लगता है तब मूत्राशय पर पड़ने वाले दबाव के कारण गर्भवती स्त्री को बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा होने लगती है। कई बार इस समस्या के साथ मूत्र की जांच करने पर उसमें एल्ब्यूमिन प्रोटीन मिल सकता है। ऐसी अवस्था में चन्द्रप्रभा वटी (आयुर्वेदिक औषधी) की 2-2 गोली दी जाती है।

 

3. कब्जियत- गर्भावस्था के दौरान कब्ज होना भी एक आम समस्या है। इसके मुख्य कारण होते हैं- महिला का पाचन खराब होना, अनियमित खानपान, दूषित या बासी भोजन करना आदि।

सबसे पहले खान-पान का क्रम सुधार करें तथा आहार में दूध, घी, मोटा अनाज, दलिया जैसे पौष्टिक आहार ताजा बनाकर सेवन करें। इस अवस्था में तेज जुलाब बिल्कुल न लें। हल्के स्निग्ध जुलाब जैसे कि 8-10 मुनक्का सुबह-शाम पानी में भिगोकर सेवन करें। त्रिफलाचूर्ण या इसबगोल की भूसी से कब्ज दूर करने का प्रयास करें। आरोग्यवर्द्धनी वटी (आयुर्वेदिक औषधी) की 2-2 गोली दूध से 10-15 दिनों तक लेकर लाभ होने पर बन्द कर दें।

 

 

4. अपचन- गर्भवती स्त्री का पाचन ठीक रहे यह आवश्यक है ताकि उसके साथ-साथ गर्भस्थ शिशु का भी उचित पोषण होता रहे। अतः गैस या अपचन हो तो भी गर्भवती स्त्री को भोजन का क्रम सुधार कर हल्का सुपाच्य मोटे अनाज से बने पदार्थ , दलिया, केला, अनार, खिचड़ी आदि का सेवन करना चाहिए। हरी सब्जियों का सलाद का अधिक सेवन करना चाहिए। लवण भास्कर चूर्ण या हिंगवाष्टक चूर्ण की आधा से एक ग्राम भोजन के पहले लें। ज्यादा परेशानी हो तो 10-15 दिन तक शंखवटी या गैस हर वटी की 2-2 गोली पानी से लें।

 

5. मांसपेशियों का शूल- गर्भ के बढ़ने के साथ ही मांसपेशियों में खिंचाव और तनाव बढ़ जाने से दर्द या ठन बढ़ जाती है। ऐसे समय में आराम की आवश्यकता होती है। गर्भवती को कैल्शियम की पर्याप्त आपूर्ति के लिए दूध का सेवन बढ़ा देना चाहिए। दर्दनाशक औषधियों का सेवन करना गर्भवस्था में ठीक नहीं रहता अतः चिकित्सकीय परामर्श के बगैर इनका सेवन करना उचित नहीं होता।

 

6. खून की कमी (रक्ताल्पता)- गर्भवती स्त्री को उल्टियां, अजीर्ण, कब्ज, पौष्टिकता का अभाव या अन्य किसी रोग जैसे बवासी के कारण खून की कमी हो जाती है। एक सर्वे के अनुसार भारत में अधिकांश स्त्रियां खून की कमी से पीड़ित हैं जिसका प्रमुख कारण है स्त्रियों की स्वयं के प्रति लापरवाही व पौष्टिक भोजन का अभाव। कम उम्र में गर्भधारण करना भी एक कारण है।

कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक गर्भवती स्त्री को समय-समय पर खून की जांच करा कर हीमोग्लोबिन के स्तर का पता लगाते रहना चाहिए। यदि इसका स्तर कम हो तो फलों का रस जैसे अनार, सेवफल, चुकुन्दर आदि का प्रयोग करना चाहिए। चिकित्सा की दृष्टि से, गर्भपाल रस, धात्री लौह तथा ताप्यादी लौह की 1 से 2 गोली सुबह शाम दूध के साथ लें। द्राक्षासव व लोहासव की 10-10 zy मात्रा भोजन उपरान्त लें। हिमॉल सिरप 10 zy एवं रक्तोजिन टेबलेट की 1 से 2 गोली नियमित ले या स्थानीय चिकित्सक से परामर्श कर आवश्यक औषधि लें।

 

7. रक्तस्त्राव– गर्भवस्था के दौरान यदि सत्री को किसी भी प्रकार का रक्तस्त्राव योनिमार्ग से हो तो से चिन्ता का विषय मानकर गर्भवती को तुरन्त आराम कराएं। पूर्णतः बिस्तर पर रखते हुए बिस्तर का सिर की ओर का हिस्सा नीचे और पैर का हिस्सा थोड़ा सा ऊपर रखें।

रक्तस्त्राव को रोकने के लिए निम्न चिकित्सा करें– शुभ्राभस्म 1- ग्राम, प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम तथा मुक्तापिष्टी 2 ग्राम – सबको अच्छे से मिलाकर 30 पुड़िया बना लें। एक-एक पुड़िया सुबह-शाम दूध से दें।

 

 

8. स्वास्थ्यवर्द्धक उपाय– गर्भवस्था के दौरान, गर्भवती स्त्री व गर्भस्थ शिशु के लिए अत्याधिक हितकारी रसायन है सोमघृत। सोमघृत गर्भावस्था के दूसरे माह से आठवें मास तक निरन्तर सेवन कराना चाहिए। इसके सेवन से गर्भवती का पाचनतन्त्र स्वस्थ होता है और रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है तथा गर्भस्थ शिशु का समुचित विकास होता है।

सोमघृत की एक-एक चम्मच मात्रा सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करें। यदि दूध से परेशानी हो तो दाल या रोटी के साथ भी सका सेवन किया जा सकता है। इसी के साथ गर्भपाल रस 10 ग्राम, ग्रभ चिन्तामणि रस 2 ग्राम, प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम, मुक्तापिष्टी 2 ग्राम तथा ताप्यादि लौह 5 ग्राम मिलाकर 30 मात्रा बना लें। एक-एक मात्रा सुबह-शाम दूध या शहद के साथ लें।

 

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